संविधान का प्रस्तावना
सर्वप्रथम अमेरिका संविधान में प्रस्तावना को सम्मिलित किया गया था तदुपरांत कई अन्य देशो ने इसे अपनाया, जिनमे भारत भी शामिल है प्रस्तावना शांविधान के परिचय अथवा भूमिका को कहते है इसमें शंविधान का शार होता है प्रख्यात न्यायविद व शंवेधानिक विशेषज्ञ एन,ए पालकीवाला ने प्रश्तावना को शांविधान का परिचय पत्र कहा है
प्रस्तावना के तत्व
१ शांविधान के अधिकारी का स्रोत ; प्रश्तावना कहती है की शांविधान भारत के लोगो से शक्ति अधिग्रहीत करता है
२ भारत की प्रकर्ति ; यह घोसना करती है की भारत एक संप्रभु, समाजिक, धर्मनिर्पेच, लोकतान्त्रिक व गणतांत्रिक राजवयवस्था वाला देश है
३ शांविधान के उद्देश्य ; इसके अनुशार न्याय , स्वतंत्रता , समानता व बंधुत्व के उद्देश्य है
४ शांविधान लागु होने की तिथि ; भरता का संविधान २६ नवम्बर १९४९ को लहू हुआ
प्रस्तावना का महत्व ; प्रस्तावना में उस आधारभूत दर्सन और राजनैतिक, धार्मिक व नैतिक मौलिक मूल्यों का उल्लेख है जो हमारे संविधान के आधार है इसके संविधान सभा की महान और आदर्श सोंच उल्लिखित है इसके अलावा यह संविधान की नीव रखने वालो के सपने और अभिलाषाओं का परिलक्छण करती है शांविधान निर्माण में मत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले संविधान सभा के आद्यकछ सर अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर के शब्दों में " संविधान की प्रस्तावना हमारे दीर्घकालिक सपनो का विचार है "
संविधान सभा की प्रारूप शमिति के सदश्य के. एम.मुंशी के अनुशार प्रस्तावना " हमारी संप्रभु लोकतान्त्रिक गणराज का भाविस्फल है
संविधान के एक और सदस्य पंडित ठाकुर दास भार्गव ने कहा "प्रस्तावना शांविधान का सबसे सम्मानित भाग है यह शांविधान की आत्मा है यह शांविधान की कुंजी है यह शांविधान का आभुषण है यह इक उचित स्थान है जहां से कोई भी संविधान का मूल्यांकन केर सकता है "
सुप्रशिद्ध अंग्रेज राजनीतिशास्त्री सर अर्जेस्ट बार्कर शांविधान की प्रस्तावना लिखने वाले को राजनितिक बुद्धिजीवी कहकर अपना शम्मन देते है वह प्रस्तावना को शांविधान का 'कुंजी नोट ' कहते है वह प्रस्तावना के पाठ से इतने प्रभावित थे की उन्होंने अपनी प्रशिद्ध पुष्तक 'प्रिंसिपल्स ऑफ़ सोशल एंड पोलिटिकल थ्यरी ' (१९५१) की शुरुआत में इसका उल्लेख किया है
पस्तावना में शंसोधन की सम्भावना ;
क्या प्रस्तावना में शांविधान की धारा ३६८ के तहत संशोधन किया जा सकता है यह पश्न पहली बार ऐतिहासिक केस केशवानंद भारती मामले (१९७३) में उठा यह विचार सामने आया की इसमें शंशोधन नहीं किया जा सकता क्योकि यह संविधान का भाग नहीं है याचिकाकर्ता ने कहा की अनुछेद ३६८ के जरिए संविधान के मूल तत्व व मूल विशेस्ता जो की प्रस्तावना में उल्लिखित है को ध्वस्त करने वाला संसोधन नहीं किया जा सकता
हालाकि उच्चतम न्ययालय ने व्यवस्था दी की प्रस्तावना संविधान का एक भाग है न्ययालय ने अपना यह मत बेरुवाडी संघ के तहत किया और खा की पूर्व में इस केस में निर्माण गलत था और कहा की प्रस्तावना को संशोधित किया जा सकता है बशर्ते मूल विशेताओ में संसोधन नहीं किया जाये
अब तक प्रस्तावना को केवल एक बार ४२वे संविधान संशोधन अधिनियम १९७६ के तहत संसोधित किया गया था इसके जरिये इसमें तीन नए शब्द जोड़े गए - समाजवाद , धर्मनिर्पेच्छ , एवं अखंड
इस संशोधन को वेध ठहराया गया
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